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॥ श्री गणेश जी की आरती (Lyrics in Hindi) ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
एकदन्त, दयावन्त, चारभुजाधारी।
माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारी॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा…॥
अन्धन को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा…॥
पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा…॥
दीनन की लाज राखो, शम्भु-सुत वारी॥
कामना को पूर्ण करो, जाऊँ बलिहारी॥
‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा…॥
📌 भगवान श्री गणेश: परिचय एवं जरूरी बातें
- दिव्य स्वरूप: गजमुख (हाथी का मुख), एकदंत, चार भुजाधारी और मूषक वाहन।
- प्रमुख नाम: विनायक, गजानन, लंबोदर, एकदंत और विघ्नहर्ता।
- प्रिय रंग व वस्त्र: सिंदूरी लाल और पीला (पवित्रता व ऊर्जा का प्रतीक)।
- प्रिय भोग: मोदक, मोतीचूर के लड्डू और ऋतु फल।
- प्रिय पत्र व पुष्प: 21 दूर्वा (दूब घास) और लाल गुड़हल का पुष्प।
- पूजन का सही समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय अथवा संध्या आरती के दौरान।
- पाठ का फल: समस्त विघ्नों का नाश, सुख-समृद्धि, विवेक और कार्यसिद्धि।
॥ श्री गणेश ध्यान एवं सिद्ध मंत्र ॥
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
बीज मंत्र: ॐ गं गणपतये नमः
सरल जप विधि: आरती प्रारंभ करने से पूर्व पूर्व दिशा की ओर मुख करके इस मंत्र का 3, 7 या 11 बार स्मरण करें।
प्रथम पूज्य श्री गणेश और इस पावन आरती का रहस्य
सनातन संस्कृति में किसी भी मांगलिक उत्सव, शुभ कार्य या दैनिक पूजन का आरंभ विघ्नविनाशक भगवान श्री गणेश की स्तुति से ही होता है। शुद्ध अंतःकरण से आरती का गायन करने पर घर का वातावरण सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। पूजन-पद्धति की प्रामाणिक परंपरा को समझने के लिए जानिए कि आरती की सही विधि और इसका वैज्ञानिक महत्व हमारे चित्त को शांत और स्थिर करने में कितना प्रभावशाली है।
‘जय गणेश देवा’ की रचना इतनी सरल और गेय है कि हर पीढ़ी का भक्त इसे आसानी से गा सकता है। यह आरती हमें बुद्धि, विवेक और निष्काम समर्पण का पाठ पढ़ाती है। आइए, अब इस दिव्य आरती के प्रत्येक पद का प्रामाणिक क्रम में सरल शब्दार्थ और भावपूर्ण अर्थ समझें।
श्री गणेश आरती: सम्पूर्ण पद, शब्दार्थ एवं भावपूर्ण भावार्थ
॥ ध्रुवपद (स्थायी टेक) ॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
शब्दार्थ: जाकी = जिनकी (Whose) | महादेवा = भगवान शिव (Lord Shiva)।
भावार्थ: हे प्रथम पूज्य, विघ्नविनाशक देवा! आपकी सदैव जय-जयकार हो। आपकी माता साक्षात जगदम्बा पार्वती जी हैं और आपके पिता देवाधिदेव महादेव शिव हैं। हे प्रभु, हम आपको बारंबार प्रणाम करते हैं।
॥ पद 1 ॥
एकदन्त, दयावन्त, चारभुजाधारी।
माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारी॥
शब्दार्थ: एकदन्त = एक दांत वाले (Single-tusked) | दयावन्त = करुणा के सागर (Merciful) | मूसे = मूषक/चूहा (Mouse vehicle)।
भावार्थ: हे दयानिधान भगवान! आप एकदंत और चार दिव्य भुजाओं को धारण करने वाले अत्यंत करुणामयी देव हैं। आपके मस्तक पर सिंदूरी तिलक शोभा पा रहा है और आप मूषकराज की सवारी करते हैं।
॥ पद 2 ॥
अन्धन को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
शब्दार्थ: काया = निरोगी शरीर (Healthy body) | बाँझन = निःसंतान स्त्री (Childless) | माया = धन-ऐश्वर्य (Wealth)।
भावार्थ: हे कृपालु देव! आप दृष्टिहीनों को दिव्य ज्योति देते हैं और रोगियों को निरोगी काया का वरदान देते हैं। आप निःसंतानों को योग्य संतान और निर्धनों को धन-संपत्ति प्रदान कर सबका उद्धार करते हैं।
॥ पद 3 ॥
पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा॥
शब्दार्थ: मेवा = सूखे मेवे/फल (Dry fruits) | सन्त = ज्ञानी व साधक भक्त (Devotees/Saints)।
भावार्थ: हे गजानन प्रभु! आपकी सेवा में भक्तजन तांबूल (पान), सुगंधित पुष्प और उत्तम मेवे अर्पित करते हैं। आपको प्रिय मोदक और लड्डुओं का भोग लगाया जाता है और सभी साधु-संत निष्काम भाव से आपकी सेवा करते हैं।
॥ पद 4 ॥
दीनन की लाज राखो, शम्भु-सुत वारी॥
कामना को पूर्ण करो, जाऊँ बलिहारी॥
‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
शब्दार्थ: दीनन = असहाय व विनम्र जन (Humble seekers) | शम्भु-सुत = शिवपुत्र गणेश (Son of Shiva) | बलिहारी = न्योछावर (Devoted surrender)।
भावार्थ: हे दीनबंधु शम्भुसुत! अपने असहाय भक्तों की मर्यादा की रक्षा करें, हमारी सभी सात्विक कामनाओं को पूर्ण करें, हम आपके इस पावन स्वरूप पर बारंबार न्योछावर जाते हैं। हे प्रभु, हम सब अनन्य भाव से आपकी शरण में आए हैं, हमारी इस भक्ति और सेवा को स्वीकार कर सफल कीजिए।
दैनिक पूजन में आरती के साथ-साथ यह भी समझें कि चालीसा क्या है और इसका दैनिक पाठ क्यों किया जाता है। इन दोनों का समन्वय साधक को मानसिक शांति और संबल देता है। पूरे विश्व में पूजनीय भगवान गणेश के ऐतिहासिक व वैश्विक स्वरूप (Lord Ganesha Wikipedia) की गाथाएं आज भी हर पीढ़ी को नई दिशा दिखाती हैं।
श्री गणेश जी की आरती करने का सही नियम और सरल विधि
- आरती थाल की तैयारी: तांबे या पीतल के स्वच्छ पात्र में शुद्ध घी या तिल के तेल का दीपक, कपूर, कुमकुम, अक्षत और दूर्वा रखें।
- घड़ी की दिशा में घुमाएं (Clockwise): आरती की थाली को भगवान के विग्रह के समक्ष हमेशा क्लॉकवाइज (दक्षिणावर्त) दिशा में घुमाएं।
- आरती का शास्त्रीय क्रम: भगवान के श्री चरणों में 4 बार, नाभि कमल पर 2 बार, मुखारविंद पर 1 बार और अंत में संपूर्ण स्वरूप के समक्ष 7 बार आरती घुमाएं।
- दूर्वा और मोदक अर्पण: आरती संपन्न होने पर गणेश जी को 21 दूर्वा और मोदक या बेसन के लड्डू का भोग लगाएं।
- आरती लेना: आरती पूर्ण होने के बाद दोनों हाथों से ज्योत की ऊष्मा ग्रहण कर अपने सिर और नेत्रों को स्पर्श कराएं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्र. 1: गणेश जी की आरती दिन में कितनी बार करनी चाहिए?
उत्तर: दैनिक गृह पूजा में सुबह और शाम (संध्याकाल) दो बार आरती करना श्रेष्ठ माना जाता है। यदि समय सीमित हो, तो प्रातः पूजन के समय एक बार भी शुद्ध मन से आरती कर सकते हैं।
प्र. 2: गणेश जी को दूर्वा (दूब घास) क्यों चढ़ाई जाती है?
उत्तर: पौराणिक कथा के अनुसार अनलासुर दैत्य के संहार के पश्चात गणेश जी के उदर का ताप शांत करने के लिए महर्षि कश्यप ने 21 दूर्वा दल अर्पित किए थे। दूर्वा विनम्रता और शीतलता की प्रतीक है।
प्र. 3: क्या आरती करते समय खड़े होना जरूरी है?
उत्तर: जी हाँ, आरती सदैव दोनों पैरों पर सीधे खड़े होकर, विनम्रता और श्रद्धा के साथ करनी चाहिए। केवल वृद्ध या अस्वस्थ व्यक्ति ही बैठकर आरती कर सकते हैं।
प्र. 4: गणेश जी की पूजा में तुलसी क्यों नहीं चढ़ाई जाती?
उत्तर: गणेश पुराण के अनुसार तुलसी जी और गणेश जी के बीच हुए संवाद के कारण गणेश जी के पूजन में तुलसी दल वर्जित माना गया है।
प्र. 5: आरती के अंत में थाल के चारों ओर जल क्यों घुमाते हैं?
उत्तर: इसे आचमन और शुद्धि का प्रतीक माना जाता है। जल घुमाने से अग्नि की प्रचंडता शांत होती है और आरती का दिव्य तेज भक्तों द्वारा ग्रहण करने योग्य बन जाता है।
📖 पाठकों के लिए अन्य उपयोगी और पावन पाठ:
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अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई आरती, मंत्र और पूजा विधि पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं, प्रामाणिक सनातन ग्रंथों और लोक-परंपराओं पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य धार्मिक ज्ञान और सांस्कृतिक समझ को सुगम बनाना है।
AI मीडिया प्रकटीकरण: इस लेख में प्रस्तुत विजुअल इमेजेस AI द्वारा जनरेटेड अथवा डिजिटल रूप से रीस्टोर (Restored) की गई कलाकृतियाँ हैं। ये केवल प्रतीकात्मक चित्रण के लिए हैं और इनमें कलात्मक भिन्नता या तकनीकी त्रुटि संभव है।